स्पेस में बनेंगे एआई डेटा सेंटर्स: प्रोजेक्ट सनकैचर के बीच मस्क का बड़ा बयान, कैसे बदलेगा कंप्यूटिंग का तरीका? – Elon Musk Predicts Ai Compute Shift Space Google Prepares Project Suncatcher Test Launch


जागृति शुक्ला

Fri, 25 Sep 2026 12:04 PM IST

सार

क्या आने वाले समय में बड़े एआई मॉडल और कंप्यूटिंग सिस्टम अंतरिक्ष में चलेंगे? स्पेसएक्स और टेस्ला के बॉस एलन मस्क की नई भविष्यवाणी ने इस चर्चा को तेज कर दिया है। मस्क का यह भविष्यवादी बयान ऐसे समय आया है, जब गूगल अपने प्रोजेक्ट सनकैचर के जरिए अंतरिक्ष में एआई कंप्यूटिंग की संभावनाओं को टेस्ट करने जा रहा है। क्या अंतरिक्ष ही भविष्य के एआई कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का नया ठिकाना बन सकता है? आइए जानते हैं, गूगल और स्पेसएक्स की इस नई पहल के बारे में…

Elon Musk Predicts AI Compute Shift Space Google Prepares Project Suncatcher Test Launch
एलन मस्क की भविष्यवाणी के बीच गूगल करेगा एआई सैटेलाइट टेस्ट – फोटो : एआई जनरेटेड

विस्तार

स्पेसएक्स और टेस्ला के प्रमुख एलन मस्क ने कंप्यूटिंग पावर के भविष्य को लेकर एक बेहद चौंकाने वाली भविष्यवाणी की है। गूगल के सीनियर डायरेक्टर (पैराडाइम्स ऑफ इंटेलिजेंस) ट्रैविस बील्स के एक वीडियो को शेयर करते हुए मस्क ने कहा कि स्पेस में कंप्यूट की मात्रा जाहिर तौर पर कुल कंप्यूट के 100 प्रतिशत तक पहुंच जाएगी। इससे पहले 13 सितंबर को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में मस्क ने संकेत दिया था कि स्पेस एक्स अगले साल एनवीडिया वीआर NLV72 एआई कंप्यूटर्स को अंतरिक्ष में लॉन्च करने की योजना बना रहा है।

क्या है स्पेसएक्स का स्टारमाइंड कॉन्सेप्ट?

  • स्पेसएक्स के अनुसार, लोकल कंप्यूटिंग क्षमता वाले ऑर्बिटल सैटेलाइट अंतरिक्ष में उपलब्ध पावर और कूलिंग का फायदा उठा सकते हैं। इन सैटेलाइट्स पर एआई कंप्यूटिंग की जा सकती है और डेटा को स्टारलिंक कॉन्स्टेलेशन के जरिए हाई-बैंडविड्थ लेजर लिंक से वापस भेजा जा सकता है।
  • इसका मतलब यह है कि एआई के लिए जरूरी कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का एक हिस्सा पृथ्वी के डेटा सेंटर्स के बजाय ऑर्बिट में स्थापित करने की संभावना पर काम किया जा रहा है।

गूगल भी एआई को अंतरिक्ष में ले जाने की तैयारी में

  • वहीं, दूसरी तरफ गूगल ने प्रोजेक्ट सनकैचर की घोषणा की है। कंपनी का कहना है कि यह एक लंबे समय का रिसर्च मूनशॉट प्रोजेक्ट है, जिसका मकसद यह पता लगाना है कि अंतरिक्ष में बड़े पैमाने पर मशीन लर्निंग इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया जा सकता है या नहीं। इसके तहत गूगल अपने टेंसर प्रोसेसिंग यूनिट्स यानी टीपीयू को अंतरिक्ष में टेस्ट करेगा।
  • पहले मिशन में एक प्रोटोटाइप सैटेलाइट लॉन्च किया जाएगा। इसका मकसद यह देखना है कि गूगल के टीपीयू चिप्स अंतरिक्ष के वातावरण में किस तरह प्रदर्शन करते हैं।

एक अक्तूबर को लॉन्च होगा टेस्ट मिशन?

  • गूगल का पहला प्रोजेक्ट संनकैचर टेस्ट मिशन एक अक्तूबर को लॉन्च के लिए निर्धारित किया गया है। इसके लिए स्पेसएक्स के फाल्कन 9 रॉकेट का इस्तेमाल किया जाएगा। इस मिशन को बड़े ऑर्बिटल एआई डेटा सेंटर की शुरुआत के तौर पर नहीं, बल्कि तकनीक की शुरुआती जांच के रूप में देखा जा रहा है।
  • दरअसल, गूगल पहले यह समझना चाहता है कि अंतरिक्ष में टीपीयू आधारित कंप्यूटिंग वास्तव में कैसे काम करती है और किन तकनीकी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

अंतरिक्ष में ही एआई डेटा सेंटर्स बनाने का आइडिया क्यों?

  • गूगल के अनुसार, इसका एक बड़ा कारण सूरज से मिलने वाली ऊर्जा है। लो अर्थ ऑर्बिट यानी LEO में मौजूद सैटेलाइट्स को लगभग लगातार सूर्य की रोशनी मिल सकती है। कंपनी के अनुसार, इससे पृथ्वी की तुलना में आठ गुना अधिक सोलर पावर पैदा की जा सकती है। यही ऊर्जा भविष्य में ऑर्बिटल कंप्यूटिंग सिस्टम को चलाने में इस्तेमाल की जा सकती है।
  • गूगल का विचार है कि अगर कई सैटेलाइट्स को एक साथ जोड़ा जाए, तो वे ऑर्बिट में रहते हुए बड़े एआई वर्कलोड को संभालने वाले क्लस्टर के रूप में काम कर सकते हैं।

गूगल ने इस कॉन्सेप्ट के लिए अलग-अलग तरह की ऑर्बिट पर विचार किया। इसमें जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट भी शामिल थी, लेकिन कंपनी के अनुसार, डॉन-डस्क ऑर्बिट इसके उद्देश्य के लिए ज्यादा उपयुक्त है। इस ऑर्बिट में सोलर पैनल्स को लगभग 24/7 सूरज की रोशनी मिलने की संभावना रहती है। इससे सैटेलाइट्स को लगातार सोलर एनर्जी मिल सकती है और लंबे समय तक कंप्यूटिंग सिस्टम चलाने में मदद मिल सकती है।

एक सैटेलाइट में दर्जनों टीपीयू चिप्स

गूगल के सीनियम डायरेक्टर ट्रैविस बील्स के अनुसार, सबसे छोटे स्तर पर एक व्यक्तिगत सैटेलाइट में दर्जनों टीपीयू चिप्स लगाए जा सकते हैं। अगर ज्यादा बड़े और जटिल एआई वर्कलोड को संभालना हो, तो कई ऐसे सैटेलाइट्स को एक साथ जोड़कर क्लस्टर्स में उड़ाया जा सकता है। इस तरह कंप्यूटिंग क्षमता को जरूरत के हिसाब से बढ़ाने की संभावना तलाश की जा रही है।

गूगल के लिए यह मिशन क्यों है खास?

गूगल का कहना है कि अंतरिक्ष को बड़े पैमाने पर एआई कंप्यूट के लिए इस्तेमाल करना एक ही मिशन में संभव नहीं होगा। पहले मिशन का फोकस यह पता लगाना है कि क्या काम करता है, कहां फेल्योर पॉइंट्स आते हैं और किन तकनीकी समस्याओं को दूर करने की जरूरत है। इन शुरुआती मिशनों से मिलने वाली जानकारी का इस्तेमाल भविष्य के मिशनों में किया जाएगा।

गूगल के सीनियर डायरेक्टर ट्रैविस बील्स का क्या कहना है?

मस्क की ओर से शेयर किए गए वीडियो में गूगल के सीनियर डायरेक्टर ट्रैविस बील्स ने इस प्रोजेक्ट के पीछे की सोच को विस्तार से साझा किया। उन्होंने कहा कि यह आइडिया इतना पागलपन भरा लगता है कि जरूर कोई वजह होगी जिससे यह काम न करे। इसलिए हमने सबसे पहले वही वजह खोजने की कोशिश की। पता चला कि यह संभव है। असल में प्रोजेक्ट संकैचर एक सरल आइडिया है। हम सूरज से मिलने वाली प्रचुर ऊर्जा का इस्तेमाल करके ऑर्बिटल डेटा सेंटर्स के जरिए एआई

इंफ्रास्ट्रक्चर को कैसे कुशलता से स्केल कर सकते हैं?

बील्स ने ऑर्बिट और स्केलिंग के तकनीकी पहलुओं पर बात करते हुए बताया:

  • डॉन-डस्क ऑर्बिट:विभिन्न कक्षाओं जैसे जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट का अध्ययन करने के बाद गूगल ने पाया कि डॉन-डस्क ऑर्बिट सबसे मुफीद है, क्योंकि इसमें सोलर पैनल्स पर लगातार 24 घंटे सूरज की रोशनी पड़ती रहती है।
  • सैटेलाइट क्लस्टर्स:सबसे छोटे स्तर पर एक व्यक्तिगत सैटेलाइट में दर्जनों टीपीयू चिप्स लगे होंगे। बड़ी समस्याओं को हल करने के लिए कई सैटेलाइट्स को आपस में जोड़कर क्लस्टर्स के रूप में उड़ाया जाएगा।
  • सूरज – ऊर्जा का परम स्रोत:हमारे सौरमंडल का मुख्य ऊर्जा स्रोत सूरज है। सोलर पावर को सरल और सबसे कुशल तरीके से स्केल करने का स्वाभाविक जवाब स्पेस में जाना ही है।

गूगल ने स्पष्ट किया है कि स्पेस को स्केलेबल एआई कंप्यूट का जरिया बनाना एक दिन में संभव नहीं होगा। एक अक्तूबर को होने वाला पहला परीक्षण मिशन यह समझने के लिए है कि वहां क्या सही से काम करता है और कहां विफलताएं आती हैं। इन प्राथमिक निष्कर्षों और अनुभवों का उपयोग भविष्य के बड़े अंतरिक्ष मिशनों को डिजाइन करने में किया जाएगा



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