बांग्लादेश:पूर्व Pm हसीना ने यूनुस पर साधा निशाना, बोलीं- अंतरिम सरकार ने किया बलिदानियों के खून का अपमान – Sheikh Hasina Slams Yunus Government On Bangladesh Genocide Day 2026


बांग्लादेश में 25 मार्च को ‘नरसंहार दिवस’ के रूप में मनाया जा रहा है। हालांकि, इस बीच देश की राजनीति में उबाल आ गया है। दरअसल, पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने यूनुस पर गंभीर आरोप लगाए हैं। हसीना ने कहा है कि जिस देश को लाखों शहीदों के खून से सींचा गया, वहां 1971 के नरसंहार के दोषियों को पुनर्वासित करने की साजिश रची जा रही है।

25 मार्च की वो ‘काली रात’

अवामी लीग के सोशल मीडिया हैंडल एक्स पर शेख हसीना ने एक संदेश जारी किया है। उन्होंने 1971 की उस खौफनाक रात को याद किया। उन्होंने कहा, “25 मार्च 1971 की रात बांग्लादेशी लोगों के जीवन की सबसे भयावह रात थी। इसी रात पाकिस्तानी सेना ने ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ शुरू किया था। इस ऑपरेशन का मकसद बंगाली समुदाय का नामोनिशान मिटाना था।” 

हसीना ने कहा कि महज 9 महीनों के भीतर 30 लाख से ज्यादा लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। उन्होंने कहा कि यह बर्बरता इतनी चरम पर थी कि बंगाली इतिहास में इसके लिए कोई शब्द तक नहीं था। इसीलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे नरसंहार का नाम दिया गया।

न्याय की प्रक्रिया पर लगा ब्रेक

इतना ही नहीं, बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने मोहम्मद यूनुस को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार ने अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद अपराधियों को सजा दिलाने का काम किया था। 

हसीना ने कहा, “यूनुस सरकार के कार्यकाल में न केवल ट्रायल को रोक दिया गया है, बल्कि सजायाफ्ता युद्ध अपराधियों को रिहा किया गया। हद तो तब हो गई जब मौत की सजा पाए एक युद्ध अपराधी को संसद का सदस्य तक बना दिया गया। यह उन लाखों शहीदों के बलिदान का अपमान है।”

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इतिहास को बदलने की कोशिश

पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा कि आज देश में एक चलन शुरू हो गया है। अब शहीदों की यादों को मिटाने और इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तानी विचारधारा को फिर से बांग्लादेश में थोपा जा रहा है। यह मुक्ति संग्राम की भावना पर सीधा हमला है।

हसीना ने देश की जनता से अपील की है। उन्होंने कहा कि सभी लोग एकजुट हों और उन ताकतों का विरोध करें जो हत्यारों का पुनर्वास कर रही हैं। हसीना के इस बयान ने बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है, खासकर ऐसे समय में जब देश अपनी आजादी के इतिहास को सहेजने और भविष्य की दिशा तय करने के बीच खड़ा है।



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